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प्लाइवुड इंडस्ट्रीज क्यों है भारी दबाव में !

March 5th 2020

प्लाइवुड और लेमिनेट उद्योग का विकास मेरे मस्तिष्क में एक फिल्म की तरह दर्ज है। वर्ष 2000 में जब वुड बेस्ड इंडस्ट्री को संगठित और विकसित करने में अपना योगदान देने के विचार से कदम रखा तो मैंने भारत के वुड पैनल स्पेस पर नजर रखना शुरू किया। अब तक इस डोमेन में 20 साल से अधिक हो गए हैं। 2001 में स्पष्ट था कि भविष्य में प्लाइवुड उद्योग का कई गुना विकास होगा और आज यह एक सच्चाई है। सचमुच तब से अब तक यह उद्योग 20 गुना बढ़ गया है।

लेकिन, वॉल्यूम ग्रोथ के साथ, इस उद्योग में मुनाफा हवा निकल गई है। उद्योग का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है, लेकिन अशांति अपने चरम पर है और स्पष्ट दिखाई दे रही है। उत्तर भारत में हजारों इकाइयों में 200 से अधिक इकाइयां या तो बंद हैं, या पूँजी की कमी से जूझ रही हैं या आगे काम करने की स्थिति में नहीं हैं। इस प्रकार, उनमें से ज्यादातर सुस्ती की मार झेल रही हैं।

 

संगठित ब्रांड की बैलेंस शीट से भी यह स्पष्ट होता है, जहां एमडीएफ, लेमिनेट, पार्टिकल बोर्ड आदि की तुलना में मुनाफा बहुत कम है। यदि कोई प्लाइवुड का उत्पादन प्रति दिन 50 टन की एक छोटी इकाई चला रहा है, तो उनके अच्छे मार्जिन की संभावना कल्पना की तरह है। यहां तक कि 100 टन/दिन क्षमता वाले प्लयेर के लिए भी अगर वे ब्याज, टैक्स और निदेशकों के वेतन को शामिल करते हैं तो इनका भी शुद्ध लाभ ३-4 फीसदी तक गिर गया है। वास्तव में, जिन इकाइयों पर ऋण का बोझ अधिक है, उनके लिए कार्य करना नकारात्मकता से भरा है। बहुत से निर्माता जागरूक हैं और चुपचाप इसे स्वीकार कर रहे हैं लेकिन इनकी भी कोई खास गतिविधि नहीं है जो भविष्य में प्लाइवुड सेक्टर को कंसोलिडेशन से बचा सके।

इस स्थिति का कारण क्या हैं? कुछ प्रमुख फैक्टर निम्नलिखित हैंः
1. लकड़ी की उपलब्धता और उद्योग का वृक्षारोपण पर फोकस की कमी
2. उत्पाद के मानकों और उपयोग किये जा रहे टेस्टिंग मेथड पर सहमति का अभाव
3. प्लाइवुड केटेगरी में उत्पाद की छवि बनाने के लिए उत्सुकता की कमी

किसी भी सेगमेंट में प्रॉफिट तब आता है जब प्रत्येक स्टेकहोल्डर का कुछ न कुछ योगदान होता है, और उत्पाद सफल होने पर फायदा होता है। प्लाइवुड सेगमंेट में, क्वालिटी वैरिएशन का एक खेल चल रहा है। क्या आप महसूस करते हैं कि विनियर की मोटाई के साथ खेलना, ग्रेडिंग करना, केमिकल में घटिया मेटेरियल मिलाना, मानकों में बदलाव के साथ बेचना, नकली और घटिया मेटेरियल को 710 कहकर बेचना आदि के साथ परिणाम क्या होगा? क्या ग्रोथ संभव है? सवाल ही नहीं है!

 

थोड़े फायदे के लिए अधिकांश स्टेकहोल्डर अपने-अपने तरीके से एक-दूसरे को काटने में लगे हैं। स्थिति तब और बिगड़ जाती है जब लकड़ी की कीमतें 800 रुपये से ऊपर चली जाती हैं। ऊपर उल्लिखित तीनो बिंदुओं पर गहन विचार करने की जरूरत है। यह सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों को बचा सकता है, जो अभी भी काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। इसलिए कदम उठाएं! यदि कोई कदम नहीं उठाए गए, तो उद्योग से बाहर होने वाले प्लेयर्स की संख्या तेजी से बढेगी। बढ़िया गुणवत्ता और अच्छी योजना के साथ व्यवसाय को व्यवसाय जैसा करने की योजना बनाना शुरू करें।

प्लाई रिपोर्टर पढ़ते रहें!

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